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INTERNATIONAL JOURNAL OF
ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION

Impact factor (QJIF): 8.4  E-ISSN: 2583-6528


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INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION


VOL.: 5 ISSUE.: 7(July 2026)

रामकथा-आधारित नारी-प्रधान आधुनिक हिंदी उपन्यासों में लैंगिक परिवेश: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन


Author(s): Dr. Vijeta Laxmi


Abstract:

रामकथा भारतीय संस्कृति की सबसे प्रभावशाली एवं दीर्घजीवी कथा-परंपरा है, जिसका पुनर्सृजन प्रत्येक युग में नए वैचारिक संदर्भों के साथ होता रहा है। परंपरागत रामकथा-वाल्मीकि रामायण एवं तुलसीकृत रामचरितमानस-मूलतः पुरुष-केंद्रित दृष्टिकोण से रची गई है, जिसमें स्त्री-पात्रों की भूमिका सहनशीलता, त्याग और मूक समर्पण तक सीमित रही है। किंतु बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से हिंदी उपन्यासकारों ने इसी रामकथा को आधार बनाकर सीता, कैकेयी, मंदोदरी, उर्मिला और अहल्या जैसी नायिकाओं को केंद्र में रखकर ऐसे उपन्यासों की रचना की, जिनमें लैंगिक असमानता, देह-राजनीति, वैवाहिक संबंधों की सत्ता-संरचना तथा पुरुषत्व की परंपरागत परिभाषा पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। प्रस्तुत शोध पत्र मृदुला सिन्हा, स्नेह ठाकुर, प्रमोद तिवारी, आशा प्रभात, किरण सिंह, नरेंद्र कोहली और अरुणा मुकिम द्वारा रचित रामकथा-आधारित नारी-प्रधान उपन्यासों का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है, जिसमें यह देखने का प्रयास किया गया है कि इन उपन्यासों में लैंगिक परिवेश किन-किन रूपों में अभिव्यक्त हुआ है-स्त्री-देह पर सामाजिक नियंत्रण से लेकर शिक्षा एवं सार्वजनिक क्षेत्र में स्त्री की भागीदारी तक, तथा पुरुष-पात्रों की मानवीय पुनर्व्याख्या तक। अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि ये उपन्यास परंपरा की पुनर्व्याख्या करते हुए समकालीन लैंगिक न्याय की चेतना को साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं, तथा स्त्री-पुरुष दोनों के मानवीय पक्षों को संतुलित एवं समावेशी दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं।

keywords:
रामकथा, नारी-प्रधान उपन्यास, लैंगिक परिवेश, लैंगिक न्याय, स्त्री-विमर्श, पितृसत्ता, देह-राजनीति, पुरुषत्व, सीता, कैकेयी, मंदोदरी, उर्मिला, अहल्या, समकालीन हिंदी उपन्यास।

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How to Cite this Article:

Dr. Vijeta Laxmi. रामकथा-आधारित नारी-प्रधान आधुनिक हिंदी उपन्यासों में लैंगिक परिवेश: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2026; 5(7):92-94,