Journal: Int. J Adv. Std. & Growth Eval.
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Impact factor (QJIF): 8.4 E-ISSN: 2583-6528
INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCE STUDIES AND GROWTH EVALUATION
VOL.: 5 ISSUE.: 7(July 2026)
Author(s): शोभा कौर और संदीप यादव
Abstract:
लोक-संस्कृति मानव जाति के समग्र और संतुलित विकास के साथ-साथ सृष्टि के सभी तत्वों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की भावना से अभिप्रेरित होकर आगे बढ़ती है। जिस तरह वेदों और उपनिषदों की मूल प्रवृत्ति लोकोन्मुखी होती है, ठीक उसी तरह लोक-संस्कृति का आधार भी लोकमंगल की भावना से अभिपूरित है। लोक संस्कृति में अभिव्यक्त लोकप्रज्ञा किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, अपितु लोक की सामूहिक अभिव्यक्ति होती है। भारतीय साहित्य के प्रख्यात हस्ताक्षर पं. विद्यानिवास मिश्र भारतीय लोकसंस्कृति के सजग प्रहरी हैं, उनके लिए लोक केवल एक अध्ययन का विषय नहीं बल्कि वह एक जीवन-दृष्टि थी। उनका विचार है कि धार्मिक स्थान पर जाना और आडंबर करना ही धर्म नहीं है, अपितु ज़रूरतमंद की सहायता करना, अहंकार रहित होना और एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील होना ही वास्तविक धर्म है। लोकसंस्कृति इसी ‘नैतिक समाज का आधार होती है।
keywords:
विद्यानिवास मिश्र, लोकसंस्कृति, शास्त्र, लोक, परंपरा, धर्म।
Pages: 70-75 | 12 View | 1 Download
How to Cite this Article:
शोभा कौर और संदीप यादव. विद्यानिवास मिश्र और लोकसंस्कृति के आयाम. Int. J Adv. Std. & Growth Eval. 2026; 5(7):70-75,